तेलुगू सिनेमा के सुपरस्टार अल्लू अर्जुन की फिल्म ‘पुष्पा पार्ट 1’ उनके करियर की पहली ऐसी फिल्म है जो हिंदी में डब होकर सीधे सिनेमाघरों में रिलीज हुई। नहीं तो उनकी हिंदी में डब फिल्में सैटेलाइट चैनलों पर ही धूम मचाती रही हैं। हैदराबाद में ‘अमर उजाला’ से सोमवार को एक खास मुलाकात में अल्लू अर्जुन स्वीकार करते हैं कि ‘पुष्पा पार्ट 1’ को सिनेमाघरों में रिलीज करने का ख्याल उन्हें इन डब फिल्मों को सैटेलाइट चैनलों पर मिलने वाली टीआरपी से ही आया। फिल्म ‘पुष्पा पार्ट 1’ के हिंदी संस्करण को मिली कामयाबी से वह काफी उत्साहित हैं और मानते हैं कि दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी संस्करणों को मिल रही सफलता भारतीय सिनेमा के लिए एक शुभ संकेत हैं और जैसे जैसे देश की हिंदी पट्टी में सिनेमाघरों की संख्या बढ़ती जाएगी, देश में सिनेमा का कारोबार और बढ़ता जाएगा। एक सवाल के जवाब में उन्होंने ये भी कहा, ‘मैं अब हिंदी फिल्में करने के लिए पूरी तरह से तैयार हूं और अच्छे प्रस्ताव लेकर आने वाले मुंबई के निर्माता निर्देशकों के लिए मेरे घर के दरवाजे पूरी तरह खुल चुके हैं।’
अल्लू अर्जुन की तेलुगू में बनी फिल्म ‘पुष्पा पार्ट 1’ हॉलीवुड फिल्म ‘स्पाइडरमैन नो वे होम’ के साथ ही देश में तमिल, कन्नड़, मलयालम और हिंदी में एक साथ रिलीज हुई। 1500 करोड़ से ऊपर की लागत से बनी ‘स्पाइडरमैन नो वे होम’ को 200 करोड़ रुपये में बनी ‘पुष्पा पार्ट 1’ ने पूरे देश में तगड़ी टक्कर दी है। ‘पुष्पा पार्ट 1’ अब अल्लू अर्जुन की ही पिछली फिल्म ‘अला वैकुंठपुरमलू’ का 293 करोड़ रुपये की कमाई का रिकॉर्ड तोड़ने की तरफ अग्रसर है। हैदराबाद के वेस्टइन होटल में मिले अल्लू अर्जुन के चेहरे पर इस कामयाबी की चमक साफ झलकती है।
अल्लू अर्जुन कहते हैं, ‘ये एक अलग तरह का अनुभव है। मुझे पता था कि मेरी फिल्मों का आकर्षण है उत्तर भारत में। सैटेलाइट चैनलों और यूट्यूब चैनलों पर मेरी हिंदी में डब फिल्मों को देखने वालों की बड़ी तादाद रही है। जब दो बार ऐसा हुआ कि मेरी हिंदी में डब फिल्म हिंदी सैटेलाइट मूवी चैनलों में सबसे ज्यादा देखी जाने वाली फिल्म बन गई तो मैंने इस बारे में विचार करना शुरू किया और ‘पुष्पा पार्ट 1’ को थिएटरों में हिंदी में रिलीज करने का फैसला इसी की परिणिति है।’
पहले ‘बाहुबली’ सीरीज की दोनों फिल्मों, फिर उसके बाद ‘केजीएफ चैप्टर 1’, उसके बाद ओटीटी पर ‘जय भीम’, ‘मारा’ और ‘मिन्नल मुरली’ जैसी फिल्में हिंदी भाषी दर्शक सबटाइटल्स के साथ देख रहे हैं। क्या उत्तर भारतीय दर्शकों की पसंद में ये बदलाव कोरोना संक्रमण काल की भी देन है? इस सवाल पर अल्लू अर्जुन कहते हैं, ‘मैं इस पर सीधे तौर पर तो टिप्पणी नहीं कर पाऊंगा। लेकिन मैं इतना कह सकता हूं कि हमारे देश में भाषाओं की सिनेमाई दीवारें गिर रही हैं। लोग अब अच्छी कहानी पर बना वैश्विक स्तर का सिनेमा देखना चाहते हैं। भाषा अब उनके लिए बाधा नहीं रही। ये नई सोच के नई पीढ़ी के दर्शक हैं और इनकी पसंद अब सितारे नहीं बल्कि कहानी और उसे परदे पर पेश करने का तरीका है।’
अल्लू अर्जुन का ये भी मानना है कि भारतीय सिनेमा अभी तक अपनी वांछित पहुंच भारतीय दर्शकों के बीच ही नहीं बना पाया है। वह कहते हैं, ‘आबादी के जिस अनुपात में तेलुगू भाषी लोग सिनेमा देखते हैं, अपनी आबादी के हिसाब से उतने प्रतिशत हिंदी भाषी लोग जिस दिन सिनेमा देखना शुरू कर देंगे, दुनिया में सिनेमा का सबसे बड़ा कारोबार भारत में होगा। करीब 30 फीसदी तेलुगू आबादी नियमित सिनेमाघरों तक जाती है। और, तेलुगू फिल्म उद्योग के कारोबार पर, इसकी फिल्मों के बजट पर और इसकी फिल्मों के कलेक्शन पर सीधा असर दिखता है।’
