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यूक्रेन संकट: रूस पर प्रतिबंधों से क्या डॉलर कमजोर और युवान मजबूत होगा?

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, हांगकांग
Published by: संजीव कुमार झा
Updated Thu, 10 Mar 2022 05:47 PM IST

सार

अमेरिकी डॉलर आधारित विश्व वित्तीय व्यवस्था से रूस को निकाले जाने के बाद वहां की कंपनियों ने चीनी मुद्रा और भुगतान सिस्टम को एक विकल्प के रूप में अपनाया है।

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रूसी कंपनियां और बैंक तेजी से चीन की मुद्रा युवान को अपना रहे हैं। (युवान को रेनमिनबइ भी कहा जाता है)। जानकारों का कहना है कि अमेरिकी डॉलर आधारित विश्व वित्तीय व्यवस्था से रूस को निकाले जाने के बाद वहां की कंपनियों ने चीनी मुद्रा और भुगतान सिस्टम को एक विकल्प के रूप में अपनाया है। इसे दुनिया में वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था के उभरने का शुरुआती संकेत समझा जा रहा है।

अमेरिकी लेखक और वित्तीय विशेषज्ञ जेम्स फॉक ने कहा है- ‘रूस पर लग रहे प्रतिबंधों से धीरे-धीरे युवान के अंतरराष्ट्रीय रूप लेने की स्थिति बनती जाएगी। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि युवान अचानक डॉलर का गंभीर प्रतिद्वंद्वी बन जाएगा। ऐसा होने से पहले जरूरी है कि कई दूसरी स्थितियां भी निर्मित हों।’ फॉक ‘फाइनेंशियल कोल्ड वॉरः ए व्यू ऑफ साइनो-यूएस रिलेशन्स फ्रॉम फाइनेंशियल मार्केट्स’ नाम की किताब लिख चुके हैँ।

अभी तक जो संकेत हैं, उनके मुताबिक रूसी कंपनियां चीनी बैंकों से संपर्क कर वहां खाता खोलने की संभावना का पता लगा रही हैँ। इस दिशा में दो प्रमुख घटनाएं हुई हैं। रूसी लॉजिस्टिक्स कंपनी फेस्को ट्रांसपोर्टेशन ग्रुप ने पिछले हफ्ते अपने ग्राहकों को भेजे मेल में कहा कि अब वह युवान के जरिए भुगतान को स्वीकार करेगी। इसके बाद जब मास्टरकार्ड और वीजा ने रूस में अपना कारोबार बंद कर दिया, तो रूसी बैंकों ने यूनियनपे सिस्टम को अपनाना शुरू कर दिया। यूनियनपे चीन सरकार की तरफ से संचालित भुगतान सिस्टम है।

विश्लेषकों के मुताबिक चीन के लिए ये घटनाएं उत्साहवर्धक हैं। चीनी नेता लंबे समय से डॉलर के अंतरराष्ट्रीय वर्चस्व को लेकर शिकायत करते रहे हैं। उनकी दलील है कि इस वर्चस्व के कारण अमेरिका प्रतिबंधों को सहारा लेकर दूसरे देशों को अपने हित के मुताबिक नीतियां अपनाने के लिए मजबूर करता है। अपनी इसी शिकायत के समाधान के तौर पर चीन युवान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की कोशिश में गंभीरता से जुटा रहा है। 2016 में जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने विशेष ड्रॉइंग राइट्स बास्केट में युवान को शामिल कर लिया, तो उसे इस दिशा में चीन की बड़ी सफलता समझा गया।

लेकिन कई जानकारों की राय है कि अब तक चीन सरकार ने युवान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की कोशिश आधे-अधूरे मन से ही की है। यही वजह है कि दुनिया में कुल कारोबार में सिर्फ दो प्रतिशत का भुगतान युवान में होता है। फिर एक समस्या यह भी है कि चीन सरकार युवान पर अपना नियंत्रण खत्म करना नहीं चाहती। उसकी सख्त पूंजी नियंत्रण की नीति के कारण चीन से अपनी संपत्ति को बाहर ले जाना मुश्किल बना हुआ है। इन वजहों से अंतरराष्ट्रीय कारोबारी युवान को अपनाने में अनिच्छुक रहे हैँ।

इस बीच एक राय यह भी है कि चीनी बैंक अमेरिका से टकराने के मूड में नहीं हैं। वे खुद पर अमेरिकी प्रतिबंध लगने की संभावना से आशंकित हैँ। लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद नए हालत भी बने हैं। फॉक ने अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस.कॉम को दिए एक इंटरव्य् में कहा है- प्रतिबंधों का यह निश्चित असर होगा कि रूस अपने पास अधिक मात्रा में युवान रखने लगेंगे। उन्होंने कहा- ‘शतरंज के बोर्ड पर अभी बहुत सी चालें चली जानी हैं। अधिक संभावना यह है कि यह खेल दशकों तक जारी रहेगा।’

विस्तार

रूसी कंपनियां और बैंक तेजी से चीन की मुद्रा युवान को अपना रहे हैं। (युवान को रेनमिनबइ भी कहा जाता है)। जानकारों का कहना है कि अमेरिकी डॉलर आधारित विश्व वित्तीय व्यवस्था से रूस को निकाले जाने के बाद वहां की कंपनियों ने चीनी मुद्रा और भुगतान सिस्टम को एक विकल्प के रूप में अपनाया है। इसे दुनिया में वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था के उभरने का शुरुआती संकेत समझा जा रहा है।

अमेरिकी लेखक और वित्तीय विशेषज्ञ जेम्स फॉक ने कहा है- ‘रूस पर लग रहे प्रतिबंधों से धीरे-धीरे युवान के अंतरराष्ट्रीय रूप लेने की स्थिति बनती जाएगी। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि युवान अचानक डॉलर का गंभीर प्रतिद्वंद्वी बन जाएगा। ऐसा होने से पहले जरूरी है कि कई दूसरी स्थितियां भी निर्मित हों।’ फॉक ‘फाइनेंशियल कोल्ड वॉरः ए व्यू ऑफ साइनो-यूएस रिलेशन्स फ्रॉम फाइनेंशियल मार्केट्स’ नाम की किताब लिख चुके हैँ।

अभी तक जो संकेत हैं, उनके मुताबिक रूसी कंपनियां चीनी बैंकों से संपर्क कर वहां खाता खोलने की संभावना का पता लगा रही हैँ। इस दिशा में दो प्रमुख घटनाएं हुई हैं। रूसी लॉजिस्टिक्स कंपनी फेस्को ट्रांसपोर्टेशन ग्रुप ने पिछले हफ्ते अपने ग्राहकों को भेजे मेल में कहा कि अब वह युवान के जरिए भुगतान को स्वीकार करेगी। इसके बाद जब मास्टरकार्ड और वीजा ने रूस में अपना कारोबार बंद कर दिया, तो रूसी बैंकों ने यूनियनपे सिस्टम को अपनाना शुरू कर दिया। यूनियनपे चीन सरकार की तरफ से संचालित भुगतान सिस्टम है।

विश्लेषकों के मुताबिक चीन के लिए ये घटनाएं उत्साहवर्धक हैं। चीनी नेता लंबे समय से डॉलर के अंतरराष्ट्रीय वर्चस्व को लेकर शिकायत करते रहे हैं। उनकी दलील है कि इस वर्चस्व के कारण अमेरिका प्रतिबंधों को सहारा लेकर दूसरे देशों को अपने हित के मुताबिक नीतियां अपनाने के लिए मजबूर करता है। अपनी इसी शिकायत के समाधान के तौर पर चीन युवान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की कोशिश में गंभीरता से जुटा रहा है। 2016 में जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने विशेष ड्रॉइंग राइट्स बास्केट में युवान को शामिल कर लिया, तो उसे इस दिशा में चीन की बड़ी सफलता समझा गया।

लेकिन कई जानकारों की राय है कि अब तक चीन सरकार ने युवान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की कोशिश आधे-अधूरे मन से ही की है। यही वजह है कि दुनिया में कुल कारोबार में सिर्फ दो प्रतिशत का भुगतान युवान में होता है। फिर एक समस्या यह भी है कि चीन सरकार युवान पर अपना नियंत्रण खत्म करना नहीं चाहती। उसकी सख्त पूंजी नियंत्रण की नीति के कारण चीन से अपनी संपत्ति को बाहर ले जाना मुश्किल बना हुआ है। इन वजहों से अंतरराष्ट्रीय कारोबारी युवान को अपनाने में अनिच्छुक रहे हैँ।

इस बीच एक राय यह भी है कि चीनी बैंक अमेरिका से टकराने के मूड में नहीं हैं। वे खुद पर अमेरिकी प्रतिबंध लगने की संभावना से आशंकित हैँ। लेकिन यूक्रेन युद्ध के बाद नए हालत भी बने हैं। फॉक ने अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस.कॉम को दिए एक इंटरव्य् में कहा है- प्रतिबंधों का यह निश्चित असर होगा कि रूस अपने पास अधिक मात्रा में युवान रखने लगेंगे। उन्होंने कहा- ‘शतरंज के बोर्ड पर अभी बहुत सी चालें चली जानी हैं। अधिक संभावना यह है कि यह खेल दशकों तक जारी रहेगा।’

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