यूपी में शुरू होने जा रहा कुशीनगर हवाई अड्डा सिर्फ अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी ही नहीं बल्कि दुनिया तक भारत की सांस्कृतिक गाथा और बौद्ध सर्किट तक पहुंच का बड़ा जरिया भी बनने जा रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर पर्यटन का विस्तार तो होगा ही, रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। बौद्ध धर्मावलंबी और पर्यटक न सिर्फ कुशीनगर कम समय में पहुंचेंगे, बल्कि बौद्ध सर्किट और बौद्ध तीर्थ स्थलाें का दौरा भी आसान होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार को इसका लोकार्पण किया।
बौद्ध सर्किट और इसका महत्व
गौतम बुद्ध के आखिरी दिनों का वर्णन समेटे महापरिनिर्वाण सुत्त में लिखा है कि बौद्ध धर्म के अनुयायियों को चार जगहों पर जरूर जाना चाहिए- पहला लुंबिनी (नेपाल), जहां गौतम बुद्ध का जन्म हुआ। दूसरा बिहार में बोधगया, जहां उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। तीसरा सारनाथ, जहां उन्होंने पहला उपदेश दिया और चौथा कुशीनगर, जहां भगवान महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए।
कुशीनगर क्यों बना सर्किट का केंद्र
कुशीनगर बौद्ध सर्किट का केंद्र बिंदु है। यहां से 150 किमी दूरी पर लुंबिनी है, उसी के निकट कपिलवस्तु भी है। लुंबिनी से 82 किलेमीटर दूर ही श्रावस्ती है, तो सारनाथ भी कुशीनगर से 225 किलोमीटर पर है। इस प्रकार बौद्ध सर्किट का महत्वपूर्ण स्थल कुशीनगर है।
- 2008 में बनी योजना। 2010 में केंद्र से मंजूरी। 590 एकड़ भूमि अधिग्रहीत।
- 2019 में राज्य व एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया का एमओयू पर दस्तखत।
- 24 जून, 2020 : अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा घोषित करने की केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी।
- कुल निर्माण लागत 255 करोड़ रुपये।
कुशीनगर और सारनाथ को मिलाकर बौद्ध सर्किट से जुड़े कुल छह स्थान हैं। इनमें कपिलवस्तु, श्रावस्ती, कौशांबी और संकिसा भी शामिल हैं।
गोरखपुर से 50 किमी दूर कुशीनगर हवाई अड्डे की बुद्धिस्ट थीम
म्यांमार, बैंकॉक, नेपाल, सिंगापुर, श्रीलंका, कोरिया, भूटान, जापान से बड़ी तादाद में आते हैं बौद्ध पर्यटक।
प्राचीन काल
कुशीनगर मल्ल वंश की राजधानी थी। इसका 16 महाजनपदों में शुमार था। चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाहियान के यात्रा वृत्तांतों में भी उल्लेख। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, यहां श्रीराम के पुत्र कुश की राजधानी थी, जिसे कुशावती कहते थे।
